पुनर्वसु नक्षत्र का स्वामी कौन है? देवता और विशेषताएँ
पुनर्वसु
पुनर्वसु नक्षत्र क्या है और उसकी विशेषताएँ क्या हैं?
पुनर्वसु नक्षत्र का स्वामी गुरु है और देवता अदिति। यह सत्ताईस नक्षत्रों में 7वाँ है, जो मिथुन 20°00′–कर्क 3°20′ तक फैला है। नाम का अर्थ ही 'फिर से बसना' — पुनर्स्थापना का नक्षत्र। जन्म के समय चंद्रमा इस नक्षत्र में हो तो विंशोत्तरी दशा क्रम गुरु से आरंभ होता है।
पुनर्वसु — नाम में ही अर्थ
पुनर्वसु का अर्थ ही है फिर से बसना या लौटकर पाना। देवी अदिति देवताओं की माता कही गई हैं और उन्हें असीमता तथा आश्रय से जोड़ा जाता है। प्रतीक तरकश है — तीर लौटकर जहाँ रखे जाते हैं।
इसीलिए शास्त्र में इस नक्षत्र को पुनर्स्थापना से जोड़ा गया है: वह क्षमता जो खोने के बाद फिर से खड़ा कर दे। यह आर्द्रा के ठीक बाद आता है, और यह क्रम स्वयं एक टीका है — मंथन के बाद पुनर्स्थापन।
पुनर्वसु नक्षत्र के नाम अक्षर
पुनर्वसु नक्षत्र के चार पाद हैं और हर पाद का अपना नाम अक्षर है: पहला पाद (मिथुन) — के; दूसरा पाद (मिथुन) — को; तीसरा पाद (मिथुन) — हा; चौथा पाद (कर्क) — ही। परंपरा में बच्चे का नाम उसी अक्षर से शुरू किया जाता है जिस पाद में जन्म के समय चंद्रमा था।
इसलिए केवल "पुनर्वसु नक्षत्र" जान लेना काफ़ी नहीं — चारों अक्षर (के, को, हा, ही) में से सही एक, पाद से ही तय होता है, और पाद हर 3°20′ पर बदल जाता है। ये अक्षर दृक पंचांग की नक्षत्र-पाद स्वर तालिका से लिए गए हैं।
गुरु का स्वामित्व और दो राशियों में विस्तार
पुनर्वसु का स्वामी गुरु है, सबसे बड़ा शुभ ग्रह, और यह नक्षत्र मिथुन के अंतिम तीन पाद तथा कर्क के पहले पाद में फैला है। कर्क वह राशि है जहाँ गुरु उच्च होता है।
इसलिए पुनर्वसु का चौथा पाद विशेष माना जाता है — नक्षत्र का स्वामी उस राशि में जहाँ वह स्वयं उच्च है। यह वह विवरण है जो केवल नक्षत्र का नाम जानने से नहीं मिलता।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
- पुनर्वसु नक्षत्र का स्वामी कौन है?
- गुरु। इसमें चंद्रमा हो तो जीवन गुरु की सोलह वर्ष की महादशा से आरंभ होता है।
- पुनर्वसु नक्षत्र के नाम अक्षर क्या हैं?
- पहला पाद (मिथुन) — के; दूसरा पाद (मिथुन) — को; तीसरा पाद (मिथुन) — हा; चौथा पाद (कर्क) — ही। नाम उस पाद के अक्षर से रखा जाता है जिसमें जन्म के समय चंद्रमा था।
- पुनर्वसु नक्षत्र के देवता कौन हैं?
- पुनर्वसु नक्षत्र के अधिष्ठाता अदिति — देवमाता हैं।
- पुनर्वसु नक्षत्र किस राशि में आता है?
- पुनर्वसु नक्षत्र मिथुन 20°00′–कर्क 3°20′ तक फैला है।
- पुनर्वसु नक्षत्र का अर्थ क्या है?
- 'फिर से बसना' या लौटकर पाना। देवी अदिति और तरकश का प्रतीक — दोनों पुनर्स्थापना की ओर संकेत करते हैं।
- पुनर्वसु किन राशियों में आता है?
- पहले तीन पाद मिथुन में और चौथा पाद कर्क में। कर्क वह राशि है जहाँ इसका स्वामी गुरु उच्च होता है।
