मूल नक्षत्र का स्वामी कौन है? देवता और विशेषताएँ

मूल

मूल नक्षत्र क्या है और उसकी विशेषताएँ क्या हैं?

मूल नक्षत्र का स्वामी केतु है और देवता निऋति। यह सत्ताईस नक्षत्रों में 19वाँ है, जो धनु 0°00′–13°20′ तक फैला है। जिसका नाम ही 'जड़' है — मूल कारण तक जाने का नक्षत्र। जन्म के समय चंद्रमा इस नक्षत्र में हो तो विंशोत्तरी दशा क्रम केतु से आरंभ होता है।

जड़ तक जाना

मूल का अर्थ ही जड़ है और प्रतीक बँधी हुई जड़ों का गुच्छा। देवी निऋति हैं, जिन्हें विसर्जन से जोड़ा जाता है। शास्त्र इस संयोजन को मूल कारण तक पहुँचने की प्रवृत्ति से जोड़ते हैं — जो ऊपर से हटाकर नीचे तक देखे।

इसका विंशोत्तरी स्वामी केतु है, जो वैराग्य और अंतर्दृष्टि का कारक है। जड़ का प्रतीक और केतु का स्वामित्व — दोनों गहराई की ओर संकेत करते हैं। यह धनु राशि का पहला नक्षत्र है, और धनु का स्वामी गुरु।

मूल नक्षत्र के नाम अक्षर

मूल नक्षत्र के चार पाद हैं और हर पाद का अपना नाम अक्षर है: पहला पाद (धनु) — ये; दूसरा पाद (धनु) — यो; तीसरा पाद (धनु) — भा; चौथा पाद (धनु) — भी। परंपरा में बच्चे का नाम उसी अक्षर से शुरू किया जाता है जिस पाद में जन्म के समय चंद्रमा था।

इसलिए केवल "मूल नक्षत्र" जान लेना काफ़ी नहीं — चारों अक्षर (ये, यो, भा, भी) में से सही एक, पाद से ही तय होता है, और पाद हर 3°20′ पर बदल जाता है। ये अक्षर दृक पंचांग की नक्षत्र-पाद स्वर तालिका से लिए गए हैं।

मूल में जन्म को लेकर फैला भय

गंडमूल नक्षत्रों में मूल का नाम सबसे अधिक भय के साथ लिया जाता है, और इसी नाम पर सबसे अधिक शांति-पूजा भी बेची जाती है। यह कहना ज़रूरी है कि यह लोक व्यवहार है, शास्त्र का अनिवार्य निष्कर्ष नहीं।

शास्त्रीय पद्धति में राशि संधि पर जन्म का फल कुंडली में चंद्रमा के बल, केतु की स्थिति और उस पर पड़ने वाली दृष्टियों से पढ़ा जाता है। केवल नक्षत्र के नाम से किसी नवजात के बारे में निष्कर्ष निकालना न शास्त्रसम्मत है, न उचित।

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

मूल नक्षत्र का स्वामी कौन है?
केतु। इसमें चंद्रमा हो तो जीवन केतु की सात वर्ष की महादशा से आरंभ होता है।
मूल नक्षत्र के नाम अक्षर क्या हैं?
पहला पाद (धनु) — ये; दूसरा पाद (धनु) — यो; तीसरा पाद (धनु) — भा; चौथा पाद (धनु) — भी। नाम उस पाद के अक्षर से रखा जाता है जिसमें जन्म के समय चंद्रमा था।
मूल नक्षत्र के देवता कौन हैं?
मूल नक्षत्र के अधिष्ठाता निऋति — विसर्जन की देवी हैं।
मूल नक्षत्र किस राशि में आता है?
मूल नक्षत्र धनु 0°00′–13°20′ तक फैला है।
मूल नक्षत्र का अर्थ क्या है?
जड़। प्रतीक बँधी हुई जड़ों का गुच्छा है और देवी निऋति। शास्त्र इसे मूल कारण तक पहुँचने की प्रवृत्ति से जोड़ते हैं।
क्या मूल नक्षत्र में जन्म अशुभ होता है?
यह गंडमूल नक्षत्र है, पर उसका फल कुंडली में चंद्रमा के बल और केतु की स्थिति से पढ़ा जाता है। नक्षत्र के नाम भर से किसी बच्चे के बारे में निष्कर्ष निकालना शास्त्रसम्मत पठन नहीं है।

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