तुला राशि का स्वामी कौन है? स्वभाव और नक्षत्र

तुला

तुला राशि क्या है और उसकी विशेषताएँ क्या हैं?

तुला राशि का स्वामी शुक्र है और इसमें चित्रा (पाद 3–4), स्वाति, विशाखा (पाद 1–3) नक्षत्र आते हैं। यह निरयण राशिचक्र की 7वीं राशि है — तत्त्व वायु, गुण चर। एकमात्र राशि जिसका प्रतीक कोई सजीव नहीं, और जहाँ शनि उच्च व सूर्य नीच होता है। यहाँ 'तुला राशि' का अर्थ चंद्रमा का तुला में होना है; सूर्य तो इसी राशि में नीच होता है, जो बिलकुल अलग बात है।

शनि यहाँ उच्च और सूर्य नीच — विपरीत जोड़ी

तुला वह राशि है जहाँ शनि 20 अंश पर उच्च होता है और सूर्य 10 अंश पर नीच। यह जोड़ी संयोग नहीं लगती: सूर्य आत्म-प्रतिष्ठा का कारक है और शनि संयम तथा दूसरों के प्रति उत्तरदायित्व का। तुला संतुलन की राशि है, इसलिए यहाँ वही ऊपर उठता है जो तौलता है और वही कठिनाई में पड़ता है जो केवल अपने को केंद्र में रखता है।

इसका व्यावहारिक अर्थ यह है कि तुला में बैठे सूर्य का पठन करते समय नीचभंग की जाँच अनिवार्य है, और तुला में बैठे शनि को सामान्य 'शनि कठिन होता है' वाली धारणा से नहीं पढ़ा जा सकता।

तुला राशि के नाम अक्षर

तुला राशि के नाम अक्षर हैं: रा, री, रू, रे, रो, ता, ती, तू, ते। ये नौ अक्षर इसलिए हैं क्योंकि हर राशि में नक्षत्रों के ठीक नौ पाद आते हैं, और परंपरा में हर पाद का एक अक्षर होता है। चित्रा (तीसरा, चौथा पाद) — रा, री; स्वाति — रू, रे, रो, ता; विशाखा (पहला, दूसरा, तीसरा पाद) — ती, तू, ते।

नाम का सही अक्षर राशि से नहीं, चंद्रमा के पाद से तय होता है। उदाहरण के लिए, तुला राशि में चंद्रमा चित्रा के तीसरे पाद में हो तो अक्षर "रा" होगा, और विशाखा के तीसरे पाद में हो तो "ते"। चंद्रमा किस पाद में था, यह जन्म के समय से तय होता है, इसलिए नामकरण से पहले कुंडली में पाद देख लेना चाहिए। ये अक्षर दृक पंचांग की नक्षत्र-पाद स्वर तालिका से लिए गए हैं।

तुला लग्न में शनि का योगकारक होना

वृषभ के साथ तुला वह दूसरा लग्न है जिसके लिए शनि योगकारक है — यहाँ वह चतुर्थ और पंचम, यानी एक केंद्र और एक त्रिकोण, दोनों का स्वामी होता है। और तुला वही राशि है जहाँ शनि उच्च भी होता है।

इसलिए तुला लग्न वालों के लिए शनि की उन्नीस वर्ष की दशा प्रायः जीवन की सबसे उपयोगी अवधि रहती है। जो लोग शनि के नाम से डरते हैं, उनके लिए यह जान लेना सबसे उपयोगी सुधार है।

एकमात्र निर्जीव प्रतीक

बारह राशियों में तुला अकेली है जिसका प्रतीक कोई प्राणी नहीं, एक वस्तु है — तराज़ू। शास्त्रीय टीकाकार इसे इस रूप में पढ़ते हैं कि इस राशि की चिंता चाहने की नहीं, तौलने की है।

शुक्र का स्वामित्व इसमें सौंदर्यबोध और संबंध जोड़ता है, पर वृषभ वाले संचय से अलग रूप में — तुला में शुक्र का काम विनिमय और न्याय-संगति से अधिक जुड़ा माना जाता है। शुक्र का मूलत्रिकोण भी तुला में ही है, 0°–15° तक।

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

तुला राशि का स्वामी कौन है?
तुला राशि का स्वामी शुक्र है। यह वायु तत्त्व और चर गुण की राशि है।
तुला राशि के नाम अक्षर कौन-से हैं?
तुला राशि के नाम अक्षर रा, री, रू, रे, रो, ता, ती, तू, ते हैं। इनमें से आपका अक्षर जन्म के समय चंद्रमा के नक्षत्र-पाद से तय होता है।
तुला राशि में कौन-कौन से नक्षत्र आते हैं?
तुला राशि में चित्रा (पाद 3–4), स्वाति, विशाखा (पाद 1–3) नक्षत्र आते हैं। जन्म का चंद्रमा इनमें से जिस नक्षत्र में हो, उसी के स्वामी से पहली महादशा शुरू होती है।
तुला राशि में कौन-सा ग्रह उच्च होता है?
शनि, 20 अंश पर। इसी राशि में सूर्य 10 अंश पर नीच होता है।
तुला लग्न के लिए शनि शुभ क्यों है?
क्योंकि तुला लग्न से शनि चतुर्थ और पंचम, यानी एक केंद्र और एक त्रिकोण, दोनों का स्वामी है, इसलिए योगकारक बनता है। और तुला उसकी उच्च राशि भी है।
सूर्य तुला में नीच क्यों होता है?
शास्त्र में इसे संतुलन की राशि में आत्म-प्रतिष्ठा की कठिनाई के रूप में पढ़ा जाता है। नीचभंग यहाँ भी लागू होता है और उसकी जाँच पहले होनी चाहिए।

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