मेष राशि का स्वामी कौन है? स्वभाव और नक्षत्र

मेष

मेष राशि क्या है और उसकी विशेषताएँ क्या हैं?

मेष राशि का स्वामी मंगल है और इसमें अश्विनी, भरणी, कृत्तिका (पहला पाद) नक्षत्र आते हैं। यह निरयण राशिचक्र की 1वीं राशि है — तत्त्व अग्नि, गुण चर। राशिचक्र की पहली राशि, जहाँ सूर्य उच्च का होता है और शनि नीच का। यहाँ 'मेष राशि' का अर्थ है जन्म के समय चंद्रमा का मेष में होना — सूर्य का नहीं, जिससे अंग्रेज़ी राशिफल चलते हैं।

सूर्य यहाँ उच्च और शनि नीच — एक ही राशि में दो छोर

मेष वह राशि है जहाँ सूर्य 10 अंश पर परम उच्च होता है और शनि 20 अंश पर नीच। मेष के बारे में सबसे ज़्यादा यही एक बात बताती है: जो गुण यहाँ खिलता है वह है पहल, आत्मविश्वास और तुरंत निर्णय; और जो यहाँ कठिनाई में पड़ता है वह है धैर्य, प्रतीक्षा और धीमी गति से बनने वाली व्यवस्था।

इसलिए मेष में बैठे ग्रहों का फल पढ़ते समय यह देखना उपयोगी होता है कि वह ग्रह शुरुआत का है या निरंतरता का। शास्त्र में मेष की शक्ति आरंभ करना बताई गई है और उसकी शास्त्रीय दुर्बलता पूरा करना।

मेष राशि के नाम अक्षर

मेष राशि के नाम अक्षर हैं: चु, चे, चो, ला, ली, लू, ले, लो, अ। ये नौ अक्षर इसलिए हैं क्योंकि हर राशि में नक्षत्रों के ठीक नौ पाद आते हैं, और परंपरा में हर पाद का एक अक्षर होता है। अश्विनी — चु, चे, चो, ला; भरणी — ली, लू, ले, लो; कृत्तिका (पहला पाद) — अ।

नाम का सही अक्षर राशि से नहीं, चंद्रमा के पाद से तय होता है। उदाहरण के लिए, मेष राशि में चंद्रमा अश्विनी के पहले पाद में हो तो अक्षर "चु" होगा, और कृत्तिका के पहले पाद में हो तो "अ"। चंद्रमा किस पाद में था, यह जन्म के समय से तय होता है, इसलिए नामकरण से पहले कुंडली में पाद देख लेना चाहिए। ये अक्षर दृक पंचांग की नक्षत्र-पाद स्वर तालिका से लिए गए हैं।

मेष लग्न में मंगल की भूमिका

मेष लग्न हो तो मंगल लग्नेश बन जाता है, और साथ ही अष्टम भाव का भी स्वामी होता है क्योंकि वृश्चिक उसकी दूसरी राशि है। इस दोहरी भूमिका के कारण मेष लग्न की कुंडली में मंगल की स्थिति असाधारण रूप से महत्वपूर्ण हो जाती है — वह लग्नेश भी है और अष्टम भाव का स्वामी भी।

मेष लग्न के लिए सूर्य पंचमेश होता है, और सूर्य का यहाँ उच्च होना इस लग्न की एक विशेष सुविधा है। शास्त्र में मेष लग्न के लिए सूर्य और गुरु दोनों को अनुकूल माना गया है।

अश्विनी, भरणी और कृत्तिका का पहला पाद

मेष में तीन नक्षत्र आते हैं — अश्विनी पूरी, भरणी पूरी, और कृत्तिका का पहला पाद। इनके स्वामी क्रमशः केतु, शुक्र और सूर्य हैं, इसलिए मेष राशि का चंद्रमा होने पर आपकी पहली महादशा इन तीन में से कोई एक होगी।

यह अंतर छोटा नहीं है: अश्विनी में जन्मे व्यक्ति की पहली दशा केतु की सात वर्ष की होगी, जबकि भरणी में जन्मे की शुक्र की बीस वर्ष की। एक ही राशि, पर जीवन का दशा क्रम बिल्कुल अलग।

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

मेष राशि का स्वामी कौन है?
मंगल। मेष लग्न में मंगल लग्नेश और अष्टमेश दोनों होता है, इसलिए उसकी स्थिति ऐसी कुंडली में सबसे अधिक भार रखती है।
मेष राशि के नाम अक्षर कौन-से हैं?
मेष राशि के नाम अक्षर चु, चे, चो, ला, ली, लू, ले, लो, अ हैं। इनमें से आपका अक्षर जन्म के समय चंद्रमा के नक्षत्र-पाद से तय होता है।
मेष राशि में कौन-कौन से नक्षत्र आते हैं?
मेष राशि में अश्विनी, भरणी, कृत्तिका (पहला पाद) नक्षत्र आते हैं। जन्म का चंद्रमा इनमें से जिस नक्षत्र में हो, उसी के स्वामी से पहली महादशा शुरू होती है।
मेष राशि में कौन-सा ग्रह उच्च होता है?
सूर्य, 10 अंश पर। इसी राशि में शनि 20 अंश पर नीच भी होता है।
मेष राशि वालों की साढ़े साती कब आती है?
साढ़े साती तब चलती है जब गोचर का शनि आपकी जन्म चंद्र राशि से बारहवीं, उसी, या दूसरी राशि में हो। मेष चंद्र राशि के लिए यह शनि के मीन, मेष और वृषभ में रहने की अवधि है।

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