धनु राशि का स्वामी कौन है? स्वभाव और नक्षत्र

धनु

धनु राशि क्या है और उसकी विशेषताएँ क्या हैं?

धनु राशि का स्वामी गुरु है और इसमें मूल, पूर्वाषाढ़ा, उत्तराषाढ़ा (पहला पाद) नक्षत्र आते हैं। यह निरयण राशिचक्र की 9वीं राशि है — तत्त्व अग्नि, गुण द्विस्वभाव। गुरु का मूलत्रिकोण, और मूल नक्षत्र की राशि। भारतीय परंपरा में 'धनु राशि' कहने का अर्थ है कि जन्म के समय चंद्रमा धनु में था, न कि सूर्य।

गुरु का मूलत्रिकोण यहीं है

गुरु धनु और मीन दोनों का स्वामी है, पर उसका मूलत्रिकोण धनु में 0° से 10° तक है। शास्त्र में मूलत्रिकोण को वह क्षेत्र कहा गया है जहाँ ग्रह अपना सबसे विशिष्ट काम करता है — उच्च से थोड़ा कम बलवान, पर स्वराशि से अधिक।

इसका व्यावहारिक अर्थ यह है कि धनु के आरंभिक दस अंशों में बैठा गुरु विशेष रूप से बलवान माना जाता है, और यह वह विवरण है जो केवल 'गुरु स्वराशि में है' कहने से छूट जाता है।

धनु राशि के नाम अक्षर

धनु राशि के नाम अक्षर हैं: ये, यो, भा, भी, भू, धा, फा, ढ, भे। ये नौ अक्षर इसलिए हैं क्योंकि हर राशि में नक्षत्रों के ठीक नौ पाद आते हैं, और परंपरा में हर पाद का एक अक्षर होता है। मूल — ये, यो, भा, भी; पूर्वाषाढ़ा — भू, धा, फा, ढ; उत्तराषाढ़ा (पहला पाद) — भे।

नाम का सही अक्षर राशि से नहीं, चंद्रमा के पाद से तय होता है। उदाहरण के लिए, धनु राशि में चंद्रमा मूल के पहले पाद में हो तो अक्षर "ये" होगा, और उत्तराषाढ़ा के पहले पाद में हो तो "भे"। चंद्रमा किस पाद में था, यह जन्म के समय से तय होता है, इसलिए नामकरण से पहले कुंडली में पाद देख लेना चाहिए। ये अक्षर दृक पंचांग की नक्षत्र-पाद स्वर तालिका से लिए गए हैं। पूर्वाषाढ़ा के कुछ पादों के अक्षर पर स्रोतों में मतभेद है, इसलिए वहाँ किसी जानकार से पुष्टि कर लेना ठीक रहेगा।

मूल नक्षत्र और उससे जुड़ी परंपरा

धनु का पहला नक्षत्र मूल है, जिसका स्वामी केतु और देवी निऋति हैं। मूल नक्षत्र में जन्म को लेकर लोक परंपरा में बहुत आशंका जुड़ी है, और इसी नाम पर सबसे अधिक भय भी बेचा जाता है।

शास्त्र में मूल को जड़ तक जाने और मूल कारण खोजने से जोड़ा गया है, और उसकी कठिनाई का पठन कुंडली में केतु की स्थिति तथा चंद्रमा के बल पर निर्भर करता है। केवल नक्षत्र के नाम से किसी बच्चे के बारे में निष्कर्ष निकालना शास्त्रसम्मत पठन नहीं है।

धनु लग्न — गुरु लग्नेश होने पर

धनु लग्न में गुरु लग्नेश और चतुर्थेश दोनों होता है, और यह उन स्थितियों में से है जहाँ सबसे बड़ा शुभ ग्रह सबसे अनुकूल भूमिका में आ जाता है। इसकी तुलना वृषभ लग्न से करने पर अंतर स्पष्ट होता है, जहाँ वही गुरु अष्टम और एकादश का स्वामी होता है।

यही एक तुलना बताती है कि 'गुरु शुभ ग्रह है' एक सामान्य वर्गीकरण है, किसी कुंडली के बारे में वचन नहीं।

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

धनु राशि का स्वामी कौन है?
गुरु, और गुरु का मूलत्रिकोण भी धनु में ही है — 0° से 10° तक।
धनु राशि के नाम अक्षर कौन-से हैं?
धनु राशि के नाम अक्षर ये, यो, भा, भी, भू, धा, फा, ढ, भे हैं। इनमें से आपका अक्षर जन्म के समय चंद्रमा के नक्षत्र-पाद से तय होता है।
धनु राशि में कौन-कौन से नक्षत्र आते हैं?
धनु राशि में मूल, पूर्वाषाढ़ा, उत्तराषाढ़ा (पहला पाद) नक्षत्र आते हैं। जन्म का चंद्रमा इनमें से जिस नक्षत्र में हो, उसी के स्वामी से पहली महादशा शुरू होती है।
मूल नक्षत्र किस राशि में आता है?
धनु में, और वह इस राशि का पहला नक्षत्र है। उसका विंशोत्तरी स्वामी केतु है।
क्या धनु में कोई ग्रह उच्च होता है?
नहीं। सिंह और कुंभ की तरह धनु भी उन राशियों में है जिनमें किसी ग्रह का न उच्च है न नीच।

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